शेफाली शाह का खुलासा: “आज भी लगता है मैं यहाँ की नहीं हूँ”

नेशनल अवॉर्ड विजेता और इंटरनेशनल लेवल पर सराही गई एक्ट्रेस शेफाली शाह ने पहली बार एक ऐसी सच्चाई दुनिया के सामने रखी है, जिसे वह अब तक अपने अंदर ही दबाए रखती थीं। अपने शानदार करियर, वैश्विक प्रशंसा और दमदार भूमिकाओं के बावजूद, शेफाली आज भी इम्पोस्टर सिंड्रोम, “यहाँ न अपनाए जाने” की भावना और “काफी अच्छी न होने” के डर से जूझती हैं।

टाइम्स नाउ और टाइम्स नाउ नवभारत की ग्रुप एडिटर-इन-चीफ़ नविका कुमार से बातचीत में उन्होंने माना कि उनकी निडर, मजबूत स्क्रीन–पर्सनैलिटी के पीछे बहुत गहरी निजी लड़ाई छिपी है — एक ऐसी लड़ाई जिसे उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से प्रकट नहीं किया था

शेफाली ने स्वीकार किया:
“सुंदरता के एक स्टीरियोटाइप है — लंबा, पतला, गोरा। मैं इनमें से किसी में भी फिट नहीं बैठती थी। मुझे हमेशा लगता था कि मैं हीरोइन नहीं बनूँगी… मैं बस एक्टिंग चाहती थी।”

उनकी यह सोच सिर्फ़ insecurity नहीं थी, बल्कि वह सालों तक इसे सच मानकर चलीं।

उन्होंने उन शांत, दर्दनाक सालों को याद किया, जब काम पूरी तरह गायब हो गया था।

  • कोई रोल नहीं
  • कोई कॉल नहीं
  • कोई भरोसा नहीं

मातृत्व के बाद तो इंडस्ट्री ने उन्हें लगभग गायब मान लिया था। वह कई सालों तक इंतज़ार करती रहीं — यह सोचते हुए कि क्या कोई उन्हें फिर से मौका देगा।


“आज भी ‘एक्शन’ सुनते ही मैं जम जाती हूँ”

अपनी चिंता पर बात करते हुए उन्होंने कहा:

“आज भी जब डायरेक्टर ‘एक्शन’ कहते हैं, मेरे अंदर डर भर जाता है, जैसे कैमरे के सामने मेरा पहला दिन हो। नेशनल अवॉर्ड मिलने के बाद भी मैंने खुद से कहा—शायद यह किस्मत थी… शायद मैं इसे दोबारा नहीं कर पाऊँगी।”

इतनी बड़ी कलाकार से यह स्वीकारोक्ति उनके अंदर छिपे संवेदनशील इंसान की झलक देती है।


दिल्ली क्राइम ने बदली दिशा — “मेरा असली करियर यहीं से शुरू हुआ”

उम्र, खूबसूरती और पारंपरिक हीरोइन की छवि से जुड़े स्टीरियोटाइप तोड़ते हुए, शेफाली आज भारतीय कहानी कहने की दुनिया का चेहरा बन चुकी हैं।

उनका कहना है:
“मैं 365 दिन काम करना चाहती हूँ। मेरा असली करियर दिल्ली क्राइम से शुरू हुआ था। और मुझे लगता है कि मैं बस शुरुआत कर रही हूँ।”


एक छोटे कमरे से विश्व मंच तक का सफर

एक छोटे से कोहली में, जहाँ दो परिवार एक कमरे में रहते थे, वहाँ से उठकर दिल्ली क्राइम जैसे ग्लोबली प्रशंसित प्रोजेक्ट्स तक पहुँचने का सफर आसान नहीं था।
यह सफर संघर्षों से भरा था —

  • आर्थिक चुनौतियाँ
  • सामाजिक स्टीरियोटाइप
  • आत्म-संदेह
  • इंडस्ट्री का प्रेशर

लेकिन शेफाली ने हमेशा Glamorous Choices के बजाय सच्चाई और दमदार कहानी को चुना।


निष्कर्ष

यह कबूलनामा न सिर्फ़ दुर्लभ है, बल्कि प्रेरक भी।
यह हमें याद दिलाता है कि —
सबसे मज़बूत महिलाएँ भी अंदर अपने डर छुपाए रहती हैं, और फिर भी हर बार उससे ऊपर उठकर आगे बढ़ती हैं।

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